मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

में, अपनी सहेलियों और मायके वालों का सत्कार करने में 'वे' कितनी स्वतंत्र है और अपने ही घर में अपने मित्रों और उनके अनचाहे रिश्तेदारों की आवभगत करने में मैं कितना परतंत्र हूं।
कहने का मतलब यह है कि 'वे' लाखों से भली हैं, नेक हैं, खुशदिल हैं और उदार प्रकृति की भी हैं, लेकिन तभी तक जब तक कि मैं उनकी समझ के दायरे के अंदर बिना कान-पूंछ हिलाए चलता रहता हूं। अगर कहीं उनकी खींची हुई लक्ष्मण-रेखा (नहीं-नहीं, पत्नी-रेखा) का अतिक्रमण करके अपने पत्नीव्रत धर्म से मैं ज़रा भी डिगने लगता हूं तो समझ लीजिए मेरी पुश्तैनी रियासत पर सरदार पटेल की नज़र पड़ी ! अब पड़ी !
मैं शौक से बाजार जाऊं, ठाठ से सिनेमा देखूं, मजे़ से सैर करता रहूं, लेकिन मेरा पथ तभी तक सुरक्षित समझिए कि जब तक या तो 'वे' साथ हों या उनकी आज्ञा की लालटेन मेरी राह के अंधकार को दूर कर रही हो, क्योंकि बिना आज्ञा के बाजार जाना-आवारागर्दी, सिनेमा देखना-पाप और सैर करना-महान मूर्खता है। इन अपराधों का दंड भी कोई साधारण नहीं मिलता। आंसुओं के महासागर में डुबकियां लगाने से लेकर तनहाई तक की सज़ा उनके 'पीनल-कोड'में र्ज़ है। इतना ही नहीं, जुर्म संगीन होने पर कभी-कभी तो तनहाई के साथ-साथ राशन-पानी भी बंद कर दिया जाता है। अभी-अभी एक और एटम बम उनके हाथ लग गया है। अब तो बाजार-सिनेमा की तरफ रुख करते ही हमारी पाकेट मार ली जाती है और वह शरणार्थी बनाकर छोड़ा जाता है कि हमारी जेब में बस भाड़े तक को पैसे नहीं होते। उनकी भलाइयों और उनके साथ लगे हुए इस 'लेकिन' के किस्से कहां तक बयान करूं ! हाल यह है कि घर में भोजन अच्छे-से-अच्छा बनता है, मगर वह होता है सब कुछ उनकी रुचि का। कपड़े मुझे अच्छे-से-अच्छे पहनने को मिलते हैं, लेकिन मेरी पंसद के बारे में मुझसे कभी एक शब्द भी नहीं पूछा जाता।
मेरे घर में बढ़िया-से -बढ़िया क्रॉकरी है, एक-से-एक आला चित्र हैं, भगवान की कृपा से सब कुछ है, लेकिन कसम ले लीजिए कि रेडियो से लेकर आलू छीलने की मशीन तक में मेरी सलाह और समझदारी का रत्तीभर भी साझा नहीं।
सही बात तो यह है कि कभी विवाह के समय जब हम दोनों ने सप्तपदी के फेरे लगाए थे, उनमें मैं भले ही थोड़ी देर को आगे रहा होऊं, आज तो 'वे' मुझे आगे निकलने ही नहीं देतीं। अब तो खरीदे हुए घोड़े की तरह बिना कान-पूंछ हिलाए मुझे उनके इशारों पर ही चलना है। राजी से चलूं या नाराज़ी से, चलना मुझे उनके इशारों पर ही है-क्योंकि लगाम मेरी उनके ही हाथ में है।

('व्यास के हास-परिहास' से, सन्‌ 1998)

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