मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

परंतु आप जानते हैं कि आदमी अपनी प्रकृति से बैल और कलाकार नाम का प्राणी वास्तव में बिल्कुल बछड़े के समान होता है। दुर्भाग्य से वह कहीं हिन्दी का कवि भी हो तो बस, खै़र नहीं। समझो कि करेला और नीम चढ़ा। इस बिना सींग के पशु को,यह समझिए बंधन ज़रा भी नहीं सुहाते। उसे घेर-घेर कर खूंटे की ओर लाइए, वह उछल-उछल कर उससे वैसे ही दूर भागता है जैसे महावीर विक्रम बजरंगी का नाम सुनते ही भूत भाग उठते हैं। यही हाल कुछ मेरा भी समझ लीजिए। वह घेर-घेर कर लाती हैं और मैं बिदक-बिदक कर भाग खड़ा होता हूं।
उन्होंने मेरे आठ पहर चौंसठ घड़ी का एक निश्चित 'टाइम-टेबल' बना छोड़ा है कि 6 बजे उठो। और यह भी कोई बात है कि रोज़ नहाओ, इस वक्त अख़बार पढ़ो और इस वक्त चाय पियो ! खाना ठीक साढ़े नौ बजे, फिर 15 मिनट का रेस्ट और फिर सीधे चलो अपने काम पर ! और देखो, दफ्तर से ठीक साढ़े पांच बजे न लौटे तो खै़र नहीं। भूख हो या न हो, आते ही नाश्ता, फिर गप-शप, रेडियो और ब्यालू ! ख़बरदार जो रात को नौ बजे के बाद घर से बाहर पैर भी रखा तो ! नींद न आए, घड़ी पर 90 डिग्री का एंगिल बनते ही आंखें बंद कर लेनी पड़ती हैं।
आप ही बताइए कि विषुवत्‌ रेखा की पूंछ से बंधे इस गर्म देश में क्या कहीं रात को जल्दी सोया जा सकता है ? या सुबह तड़के भीनी-भीनी ठंडी बयार बह रही हो तो कहीं उठने को दिल करता है ? अपनी बात तो मैं कहूं कि सुबह-सवेरे जब मैं तीन-तीन तकियों को जांघ, बगल और सिर को नीचे दबाए सोता हुआ जागता या जागता हुआ सोता रहता हूं, तब मेरे पास और की तो चले क्या, स्वयं नेहरूजी भी आएं और खुद अपने हाथों से मुझे उत्तर प्रदेश का गवर्नर बनने का निमंत्रण भेंट करने लगें तो यक़ीन मानिए, उस समय खटिया छोड़ने पर मैं किसी भी तरह राजी नहीं हो सकता। उस वक्त या तो मैं जवाब देना ही पंसद नहीं करूंगा, अगर लाचारी से कुछ कहना ही पड़ा तो बिना आंखें खोले यही कहूंगा-जाइए-जाइए महाशय, आधी उम्र जेल में गुज़ारने वाले तुम इस शैया-सुख को क्या पहचानो ? अरे जो सुख 'राज में न पाट में, सो सुख आवे खाट में।' लेकिन आप जानते हैं कि नेहरूजी को नाराज़ करना आजकल आसान है, पर अपनी लड़की के भावी लड़के की होने वाली नानी को नाराज़ करना हंसी-खेल नहीं, क्योंकि एक तो नेहरूजी आसानी से रूठने वाले नहीं और रूठे भी तो अधिक-से-अधिक एक अंतर्राष्ट्रीय (इंटरनेशनल) स्पीच दे देंगे। मगर यह जो हमारी दिन में निन्यानबे बार नैहर की तुरुप चलाने वाली नवेली है, यदि कहीं सबेरे-सबेरे रूठ गई, तो समझ लीजिए दिनभर की खै़र नहीं !
भगवान झूठ न बुलवाए, पहले हम बहुत सच्चे और नेक आदमी थे। लेकिन अब उनकी रोज़-रोज़ की सख्ती और समय की पाबंदी ने नाहक हमें गुनाह करना और झूठ बोलना सिखा दिया है। आप ही कहिए कि दफ्तर

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