नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

शुक्लजी बोले, "इन शाखाओं के क्रमशः नाम इस प्रकार हैं- राज्याश्रयी शाखा, विश्वविद्यालयाश्रयी शाखा, अखबाराश्रयी शाखा और फटीचरी यानी निराश्रयी शाखा।''
अपने कथन की व्याख्या करते हुए शुक्लजी ने आगे कहा, "राज्याश्रयी शाखा सरकार की कृपा पर अवलंबित रहने वाले साहित्यकारों की है। इनमें कुछ तो ब्रिटिश राज के पुराने राजभक्त हैं और कुछ की भर्ती सन्‌ 47 के बाद हुई है। इनमें से कुछ तो संसद या विधानसभाओं में हैं, कुछ आकाशवाणी और सूचना-विभागों में, कुछ आफिसों और समितियों के सदस्य हैं। इनमें एक-दो राज्यपाल भी हैं। बाक़ी ऐसे लोग भी कम नहीं जो मंत्रियों, सेक्रेटरियों और डायरेक्टरों के कृपा-पात्र हैं। ये सब राज्याश्रयी शाखा के अंतर्गत आते हैं।''
शुक्लजी ने फोन पर ज़रा खांसकर कहा, "एक दिन मैंने बैठे-बैठे हिसाब लगाया था, छोटे-मोटे 999 हिन्दी साहित्यकार आज राज्याश्रय में पल रहे हैं। इन साहित्यकारों को मैंने चार कोटियों में बांटा हैं।''
बीच में रुककर शुक्लजी बोले, "आपको जल्दी तो नहीं है ?'' फिर आश्वस्त होकर बोले, "मैंने साहित्यकारों को चार कोटियों में विभक्त कर दिया है। एक वे जो विशुद्ध चारण हैं और शुद्ध जय-जयकारवादी हैं। दूसरे वे जो सरकार के प्रमुख सूत्रधारों की तो सराहना करते हैं, मगर जनता में अपने मुख को उज्ज्वल बनाए रखने के लिए तंत्र के कुछ कार्यों की कभी-कभी आलोचना भी कर लिया करते हैं। तीसरे वे हैं जो निंदा-स्तुति से दूर रहते हैं और केवल रीति-नीतियों का ही गुणगान करते हैं। इनका उद्देश्य यह है कि चाटुकारिता साहित्य में नहीं, जीवन में आनी चाहिए। यानी लोक और परलोक दोनों का इन्हें ख़याल है। ये अपना इहलोक तो राज्याश्रय से और परलोक साहित्य-साधना से बनाना चाहते हैं, जबकि दूसरे और पहले वर्ग के लोगों का ध्यान केवल इहलोक तक ही सीमित है। पर चारण-काल की तरह इन तीनों कोटि के लेखकों की कृतियां साहित्यिक दृष्टि से टिकाऊ नहीं हैं और अपने आश्रयदाताओं के साथ ही इनका भी महत्व नष्ट हो जाएगा। ऐसे लोगों के साहित्य में शब्दाडंबर और बोली की सुघड़ता तो ढूंढ़ने पर मिल जाती है, लेकिन भावों की मार्मिकता जो हृदय-संवाद की देन है और भावों की तन्मयता एवं विचारों के साधारणीकरण से आती है, इनमें नहीं पाई जाती। यद्यपि इस धारा के लोगों ने रिपोर्ताज़ से लेकर बड़े-बड़े उपन्यास और महाकाव्य तक लिखे हैं, पर वे सभी आंतरिक ऊष्मा से उद्वेलित न होने के कारण साहित्य की परिधि से बाहर हैं।''
विश्वविद्यालयाश्रयी शाखा का विश्लेषण करते हुए आचार्य बोले, "इस क्षेत्र में भी आजकल साहित्य का होलसेल प्रोडक्शन चल रहा है। हर प्रदेश में साहित्य के कई-कई कारखाने खुले हुए हैं, जहां से हर साल भारी तादाद में डॉक्टर ढाले जा रहे हैं। इधर एम.ए. पास करो और उधर डॉक्टर बनो ! देश में साहित्य की बीमारी बहुत तेज़ी से बढ़ रही है न ? उपचार के लिए डॉक्टर चाहिए ही, साहित्य में भले ही कोई व्यक्ति या ग्रंथ स्वीकृत न हुआ हो, विश्वविद्यालय की लेबोरेटरी में उस पर तत्काल काम प्रारंभ हो जाता है। भारत सरकार को अपने निर्णयों में इस विश्वविद्यालयी तत्परता से सबक लेना चाहिए।

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